तोहरा हीं छठ होवा हको कि नय - छठ पूजा



Puja pooja chhath pooja bihar bihari festival

आज कृष्णदेव माटसाब अपने मस्तिष्क के हाइपोथैलमस में महापर्व छठ की भावना लिए परमोद बाबू से पूछ रहे हैं...आँय जी तोहरा हीं छठिया होवा हको कि नय...?

हाँ होवा है जी...हमर मालकिनी करा हथीन की।

इधर सड़क पर आते जाते हरेक बस, टेकर में....बहँगी लचकत जाए...भूलोक पर एक अलग ही मंडल का निर्माण कर रही है। मानो बहँगी के साथ साथ पहिले पहिल छठ कर रही रमेसरी चाची लोहंडा के प्रसादी का मुँहजुठाई करते हुए ईश्वरीय भावना से लचक जाएंगी, ठेकुआ बनाती हुई ननद भौजाई की मुस्कान एक दूसरे को छू कर लचक जाएगी, प्रसादी बन रहे चूल्हे में आम का जलावन डालते हुए गाँव की सरिता, पिंकी, बबिता,काजल, स्वीटी की हथेलियाँ खुशी से लचक जाएँगी। घाट पर दौरा उठाते हुए पिंटुआ के पापा का हृदय प्रफुल्लित होकर लचक जाएगा। 

प्रमोद, विनोद से लचक रहा होगा उनका मन जो चेन्नई, मुंबई, हैदराबाद से ट्रेन पर बोरा की तरह लदा कर अपने अपने घर आये थे...और इधर छठ करती हुई चाची...चूल्हे के लिलार पर सिंदूर लगाते हुए अपनी गोतनी से पूछ रही होगी कि....आँय जी ठेकुआ में एक किलो मिठ्ठा डललियै हैं....और डालियै...कि हो जयतै..?

इधर चनेसरा अपने गणित के कॉपी से बीच का पन्ना फाड़ते हुए माई से कह रहा होगा....बोल न माई और कौची कौची लावे ला हौ....संतरा, सेब, बताशा, नारियल, अमरूद लिख ललियौ हें.... और माई काँसा के बर्तन में मिट्टी का लेवा लगाते हुए कहेंगी...हुमाद, अगरबत्ती तो घरे हइये हौ, कपूर, नींबू और पानीफ़ल ले लिहों।

चनेसरा झोला लेकर दुआरी से बाहर निकल ही रह होगा कि माई प्यार से बुलाते हुए कहेंगी....अरे बेटा दीपक चाचा हीं छठ नय होवा है...उनखर घरें कह दहीं खल कि आज साँझे प्रसादी खाये सभे कोई आ जैथिन।

जिस नदी के बहाव से बिहार हर साल बहता रहता है, आज वहीं का नागरिक, श्रमिक, किसान, बच्चा उसी नदी के घाट को स्नेह से सजा रहा होगा, दुलार रहा होगा, पुचकार रहा होगा। छठ ऐसे ही महापर्व नहीं है....हम अपने कलेजे के भीतर लचकते, बुलबुलाते दुलार, स्नेह और वात्सल्य से इसे महापर्व बनाते हैं। पर्व और महापर्व में बस चुटकी भर अपनत्व, दुलार, प्रेम और स्नेह का ही फर्क है। बस ये दुलार बचा रहे पर्व तो अपने आप हृदय में बचा रह जाएगा।

आप सभी को छठ पूजा की हार्दिक शुभकामनाएं।💐💐
जय छठी मईया।



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