अकेलेपन में पैदा हुए भाव से कविता, गीत का निर्माण होता है


अकेलेपन में पैदा हुए भाव से कविता, गीत का निर्माण होता है : Yogesh Gaur

आज गीतकार योगेश का जन्मदिन है। योगेश,  जिनका अनुरागी मन जब गीत पिरोया करता है तो लोगों की भावनाएं रिमझिम रिमझिम सावन की फुहारों सी बहने लगती हैं। योगेश के बारे में कई बातें कहीं जा सकती हैं। मैं यहां विशेषकर दो बातें कहना चाहूंगा। 

पहली बात है व्यक्ति के आत्म सम्मान से जुड़ी हुई। योगेश जब किशोर अवस्था में थे, तब उनके पिता का देहांत हो गया। घर की माली हालत ठीक नहीं थी इस कारण उनके लिए नौकरी करना ज़रूरी हो गया। योगेश के बड़े भाई विजय गौड़, जो उनकी बुआ के सुपुत्र थे, मुंबई की फ़िल्म इंडस्ट्री में बतौर लेखक काम कर रहे थे। योगेश उनके पास मुंबई पहुंचे। योगेश ने फ़िल्म जगत में किसी भी तरह के काम को करने की इच्छा जताई, जिससे उनके परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक हो। लेकिन विजय गौड़ ने योगेश को दुत्कार दिया। विजय का कहना था कि फ़िल्म जगत कोई नुमाइश थोड़ी न है कि दो आने के टिकट से देख ली। 

बड़े भाई के इस तरह साथ छोड़ देने से योगेश निराश तो हुए मगर यहां उनकी हिम्मत बने सत्तू। सत्तू योगेश के मित्र थे। मित्रता इतनी गहरी कि जब योगेश ने पढ़ाई छोड़ी और मुंबई काम ढूंढने अाए तो सत्तू भी संग हो लिए। योगेश का तिरस्कार सत्तू को अखर गया। सत्तू ने योगेश से कहा कि अब चाहे जो हो, तुझे फ़िल्म जगत में ही काम करना है। उस रोज़ से सत्तू काम करके पैसे लाते। योगेश अकेले दिन भर कमरे में रहते। अकेलेपन में पैदा हुए भाव से कविता, गीत का निर्माण होता। फिर कुछ ऐसे संयोग बने कि योगेश संगीतकार सलील चौधरी से मिले और फिर निर्देशक हृषिकेश मुखर्जी तक पहुंचे। और उनकी पहली फ़िल्म आईं  " आनन्द ", जिसमें उन्होंने गीतकार गुलज़ार के साथ मिलकर गीत लिखे। उनका पहला गीत बना " कहीं दूर जब दिन ढल जाए "। उसके बाद तो जो सिलसिला शुरू हुआ कि योगेश शुद्ध प्रेम को शब्द देने वाले जादूगर बन गए। " रजनीगन्धा फूल तुम्हारे महके यूं ही जीवन में ", " रिमझिम गिरे सावन ", " कई बार यूं भी देखा है ये मन की जो सीमा रेखा है " जैसे गीत योगेश की कलम से निकले। योगेश ने अपने आत्म सम्मान के बल पर अपना नाम कमाया। 

योगेश की सादगी का एक और क़िस्सा है। योगेश बहुत सरल और सीधे थे। उनके समकालीन गीतकार साहिर लुधियानवी, मजरूह सुल्तानपुरी, आनन्द बक्षी, गुलज़ार बहुत पढ़े लिखे और साहित्यिक पकड़ रखने वाले लोग थे। योगेश जी की व्यवस्थित तरीक़े से गीतकार की ट्रेनिंग नहीं थी। इसलिए वह भय में रहते थे। यही कारण था कि वह किसी भी प्रोडक्शन हाउस में कान मांगने नहीं जाते। उनको यह डर रहता कि वह इतने बड़े गीतकारों के होते हुए कहां गीत लिख सकेंगे। इस तरह जो काम योगेश तक पहुंचा, उन्होंने वह किया। यही कारण है कि योगेश गुमनाम रहे। बहुत लोग उनके गाने सुनकर जज़्बाती होते हैं मगर शायद ही किसी को उनका नाम या चेहरा याद है। 

योगेश ने उस दौर में शुद्ध प्रेम को बयां करने वाले हिन्दी गीत लिखे जब भारतीय सिनेमा जगत के गीत लेखन में उर्दू हावी थी। योगेश मुझ जैसे युवा गीतकार के लिए सरलता, सहजता, सौम्यता की मिसाल हैं। 

योगेश स्वस्थ रहे और उनके गीत हमें यूं ही अनुरागी बने रहने के लिए प्रेरित करें, प्रभु से यही प्रार्थना है।

-आशि क
20 मार्च 2020

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