व्यंग : लेखक, पाठक और प्रकाशक के बीच का द्वंद

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लेखिका के बारे में (सिनीवाली शर्मा)

सिनीवाली जी का जन्म भागलपुर (बिहार) में हुआ। बचपन से गाँव के साथ-साथ विभिन्न शहरों में प्रवास रहा। भागलपुर से ही शिक्षा (एस एम कालेज) भी प्राप्त किया। मनोविज्ञान से स्नातकोत्तर, इग्नू से रेडियो प्रसारण में पी जी डी आर पी कोर्स किया।

इनके रचना संसार की बात करें तो इनकी पहली कहानी ' उस पार ' लमही पत्रिका के जुलाई-सितंबर अंक में (२०१५) प्रकाशित  हुई। आगे चलकर इनका कहानी संग्रह ' हंस अकेला रोया ' भी प्रकाशित हुआ। हंस, आजकल, कथानक, पाखी, कथादेश,परिकथा, लमही, इन्द्रप्रस्थ भारती, बया, निकट,माटी,कथाक्रम, दैनिक भास्कर, प्रभात खबर, दैनिक जागरण, बिंदिया, आदि पत्र पत्रिकाओं में भी कहानियाँ प्रकाशित हुई।

अट्टहास एवं विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में व्यंग्य, नोटनल पर इ बुक प्रकाशित, ' सगुनिया काकी की खरी खरी ', करतब बायस -कहानी का नाट्य मंचन हिन्दी अकादमी, दिल्ली के द्वारा, महादान कहानी - कथादेश पत्रिका द्वारा कथा - समाख्या-5 के अंतर्गत चयनित, हिंदी रेडियो, शिकागो से कहानी वाचन का कार्यक्रम आदि इनकी समृद्ध कलम का दर्शन कराते हैं।


सिनीवाली जी के जन्मदिवस पर पढ़ते हैं उनकी लिखी एक व्यंग : लेखक, पाठक और प्रकाशक के बीच का द्वंद 


वैसे हम रचनाकार हैं। रचनाकार में लेखक, कवि, आलोचक, व्यंग्यकार...किसी को भी शामिल किया जा सकता है। एक बात और है, हमें टाइप्ड होना पसंद नहीं है इसलिए हम अपने आपको रचनाकार ही कहलवाना पसंद करते हैं।

रचनाकार होने के लिए लिखने में माहिर हों, ये जरूरी नहीं है। शब्द- शब्द चुन- चुन कर वो किताब सजा दें, ये भी जरुरी नहीं है। रचनाकार होने की सबसे पहली अर्हता है, उसमें धैर्य जरूर होना चाहिए। और इनके धीरज की परीक्षा संपादक और प्रकाशक अपने अपने स्तर पर लेते रहते हैं। आपको लगेगा हम झूठ बोल रहे हैं। जनाब, नहीं...बिल्कुल नहीं!आपने पिछले महीने उस प्रसिद्ध पत्रिका में जो हमारी कहानी पढ़ी थी, वो संपादक महोदय को भेजे कितने दिन हो गए, मुझे भी याद नहीं। क्या मजाल है कि हम ने उनसे कभी पूछा भी हो  कहानी के हालचाल के बारे में। पता है पूछते ही मेरी कहानी मेरे सर पर वापस पटक देंगे। उनकी लाइन में तो हम जैसे न जाने कितने धीरज की खान खड़े हैं।

प्रकाशक महोदय भी कम कड़ी परीक्षाएँ नहीं लेते। पुस्तक हमारी छाप दी, हम पर एहसान जता दिया और इस एहसान के करने के बदले हमने उन्हें हजारों रुपये पहले ही दे दिया था। पुस्तक छप गई। पहली पुस्तक में जरा अपना धीरज थोड़ी देर के लिए खो बैठा। किताब हाथ में आते ही हमारा मुखड़ा चमका जैसे कि वो किताब नहीं आईना हो और हमारा अतिसाधारण चेहरा भी रूपवान हो उठा हो। फिर पुस्तक को उलटा पलटा...गले से लगाया।

इतनी क्रिया के बाद हमें एकाएक ध्यान आया कि अरे प्रकाशक महोदय का तो हमने धन्यवाद किया ही नहीं। हमने अपना वज्रदंती निकाल कर जरा सा खींसें निपोरी और थोड़ा सा माथा झुकाकर धन्यवाद कहा, जैसे कोई मंदिर में अपने इष्टदेव के सामने अपना माथा झुका रहा हो कि हमारा ध्यान रखना। प्रकाशक महोदय भी हमारी इस अदा पर अपनी मुस्कुराहट नहीं रोक सके। उन्होंने भी अपनी खींसें निपोरी और अपनी व्यस्तता का हवाला देकर निकल लिए। 

मैंने झट किताब खोली और देखने लगा, कौन सी कविता किस पेज में जगह बना पाई है! ये क्या...हम तो हैरान ही नहीं पूरे परेशान हो गए। हमारी उन कविताओं को ऐसे छाँटकर हटाया गया जैसे खेतों में खर पतवार हटाया जाता है। ओह! वो तो मेरी सबसे अच्छी कविता थी।जिस दिन लिखा था वो दिन याद आ गया।इतनी भावुक कविता लिखना आसान थोड़े ही था। कितना रोया...तब जाकर आँसू की स्याही से वो कविता लिखी थीऔर वो कविता ! फिर रोना आ गया क्योंकि इस किताब में वो कविता थी ही नहीं। इसी कविता के शीर्षक से इस किताब का नामकरण किया था। कैसी कविता थी, उससे मिलते ही रोना आया और बिछुड़ते भी !  ए कविता, तेरे अंजाम पे रोना आया !

जब जरा बुद्धि स्थिर हुई और फिर हमने धीरे धीरे धीरज का दामन धरा तो समझ में आया कि प्रकाशक महोदय ने लागत कम करने के लिए वो कविता ही हटा दी थी।

लेकिन, हम इन छोटी छोटी बातों से नहीं घबराते। इसी कविता को लेकर हम अपनी अगली किताब छपवायेंगे जिसमें हम अपनी टीपू सुल्तान की कला  भी दिखाएंगे।

हाँ, पता है अब आप पूछियेगा कि हम पाठक कहाँ से लाएंगे ! बहुत ही आसान है, लेखक भावुक प्रकृति के होते हैं पर पाठक तो उससे भी अधिक भावुक होते हैं। हम उनकी भावुकता का फायदा उठायेंगे। ( जैसे कि आप अभी तक हमें पढ़ रहे हैं )

कैसे ? वो ऐसे कि हम विज्ञापन पर हजारों खर्च करेंगे !मठाधीशों के आगे माथा टेकेंगे ।उनका चरणरज लेंगे, तब उनकी सिद्धहस्त लेखनी हमारे लिए लिखेगी, ऐसी भाषा पहले कभी नहीं पढ़ी गई!न ऐसी शिल्प गढ़ी गई!जितना कहो, कम है!मील का पत्थर साबित होगी, और फिर इसी पत्थर को उठा कर पाठकों के सर पर पटक देंगे। साहित्य जगत में खलबली मच जाएगी।

इतना ट्रीटमेंट काफी है, इतने में पाठक का ब्रेनवाश हो ही जाएगा और हम अपने लिए दो-चार पाठक जुटा ही लेंगे।


-सिनीवाली शर्मा / Siniwali sharma

Nayiwalistory / नई वाली स्टोरी लेखिका सिनीवाली जी को जन्मदिवस की अशेष शुभकामनाएँ देती है तथा उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना करती है।

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