पाकीज़ा : बॉलीवुड इतिहास की क्लासिक फ़िल्म और मीना कुमारी का जीवन परिचय

मीना कुमारी - Meena kumari - पुण्यतिथि विशेष 31 मार्च 1972

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पाकीज़ा : बॉलीवुड इतिहास की क्लासिक फ़िल्म और मीना कुमारी का जीवन परिचय

आज मीना कुमारी की पुण्यतिथि है। दुनिया की नज़र में वह आज ही के दिन दुनिया से रुखसत हुई थी। मेरी नज़र में वह अब भी मेरे दिल में है। मुझे मीना से मिलना होता है तो बस अपनी आंखें बन्द कर लेता हूं और टटोलने लगता हूं सीने के पास का वह कोमल सा हिस्सा, जहां मीना कुमारी बसती हैं। हिस्से का कोमल होना इसलिए भी ज़रूरी है कि मीना के लिए राज कुमार फ़िल्म पाकीज़ा में फरमा चुके थे कि " आपके पांव बहुत नाज़ुक हैं, इन्हें ज़मीन पर न रखिए, यह मैले हो जाएंगे "। 

मुझ पर मीना का असली जादू पाकीज़ा देखकर ही हुआ था। साहिब बीवी और गुलाम से जिस इश्क़ का सुरूर चढ़ा था, वह पाकीज़ा देखकर खुमार में बदल चुका था। मां पूछती कि किस से शादी करेगा तो मेरी ज़बान पर मीना का नाम होता। मीना की ऐसी दीवानगी, ऐसा जुनून सवार हो गया था कि मैंने एक दिन तय कर लिया था कि मैं किसी तवायफ से ही शादी करूंगा। मीना ने तवायफ के दर्द को इस तरह बयां किया था कि मेरा मन रो पड़ा। मुझे लगा कि शादी करनी ही है तो तवायफ से करूं और उसके दुख हर लूं। लेकिन यह दिल का ख़्याल था। भावनाओं का वेग था। जब शांत हुआ और बुद्धि का विकास हुआ तो समझ आया कि प्रेम हो तो विधवा, तवायफ चाहे जिससे शादी कर लो। लेकिन किसी को तारने के लिए, उद्धार करने के लिए शादी मत करो। प्रेम करना मूल होना चाहिए, उद्धार करना नहीं। क्योंकि मनुष्य प्रेम का अभिलाषी है, सहानुभूति का नहीं। 

फ़िल्म पाकीज़ा का क़िस्सा भी ज़बरदस्त है, जो बताता है कि मीना आख़िर क्यों मीना थी। और मीना जैसा कोई और क्यूं नहीं हो सका और न हो सकेगा। 

बात सन 1955 की है.भारतीय सिनेमा के मशहूर फ़िल्मकार कमाल अमरोही साहब अपनी पत्नी मशहूर फ़िल्म अभिनेत्री मीना कुमारी के साथ दक्षिण भारत में जीवन बिता रहे थे.वही उन्हें एक ख्याल आया कि जैसे शाहजहाँ ने अपनी बेग़म मुमताज के लिए ताजमहल बनाया था, वैसे ही उन्हें भी अपनी मुहब्बत मीना कुमारी के लिए कुछ करना चाहिए.इसी सोच में उन्होंने फैसला किया कि वह मीना कुमारी को लेकर भारत की सबसे शानदार फ़िल्म बनाएँगे.कमाल अमरोही साहब चाहते थे कि इस फिल्म से मीना कुमारी बतौर एक महान अभिनेत्री भारतीय सिनेमा जगत में स्थापित हो जाएं.

बहरहाल कमाल अमरोही साहब ने मीना कुमारी को अपने मन की बात बताई और दोनों ने मिलकर सन 1958 में फ़िल्म का काम शुरू किया.कमाल अमरोही साहब ने जब फिल्म की स्क्रिप्ट लिखकर पूरी कर ली तो  अपने साथ फ़िल्म के गीत लिखने के लिए मशहूर शायर कैफ़ी आज़मी,मजरूह सुल्तानपुरी,कैफ़ भोपाली को बुलाया.इसके बाद उन्होंने फ़िल्म का संगीत देने के लिए संगीतकार ग़ुलाम मोहम्मद साहब को साइन किया.

फिल्म का नाम रखा गया "पाकीज़ा".

इसके बाद बारी आई फ़िल्म के किरदारों की कास्टिंग की। फ़िल्म का  मुख्य  किरदार साहिबजान का था जिसे मीना कुमारी निभा रही थी.कमाल अमरोही साहब ने सलीम जो कि एक बिज़नेसमैन का रोल था, उसके लिए अभिनेता अशोक कुमार को साइन किया.

जब फ़िल्म की शूटिंग शुरू हुई तो यह तय किया गया कि फ़िल्म ब्लैक एंड वाइट फॉर्मेट में बनेगी.मगर फ़िल्म की शूटिंग के शुरू होने के कुछ समय बाद भारत में रंगीन फ़िल्मों का दौर आ गया था.इसको देखते हुए कमाल अमरोही साहब ने फ़िल्म को रंगीन प्रिंट में फिर से शूट करने का फैसला किया.अभी रंगीन प्रिंट में शूटिंग शुरू हुई थी कि सिनेमास्कोप लेंस की तकनीक भारत में आ गई.कमाल अमरोही साहब ने सिनेमास्कोप लेंस रॉयलिटी बेसिस पर लेकर शूटिंग शुरू की.इसी दौरान सिनेमास्कोप लेंस से शूटिंग करते वक़्त कुछ तकनीकी दिक्कतें पेश आने लगी.जब सिनेमास्कोप लेंस निर्माता कंपनी को यह बात बताई गयी तो तो उन्होंने खेद जताते हुए फ़ौरन लेंस को ठीक करके दिया.साथ ही लेंस निर्माता कंपनी ने यह तय किया कि वह कमाल अमरोही साहब से लेंस की रॉयलिटी मनी नहीं लेगी और उन्हें यह लेंस एक उपहार के रूप में दे देगी.

इस तरह शूटिंग का काम एक बार फिर सुचारू रूप से चलता रहा.सन 1964 आते आते जब आधे से ज़्यादा फ़िल्म शूट हो गई थी तभी निजी कारणों के चलते कमाल अमरोही और मीना कुमारी अलग हो गये.हालांकि उन्होंने क़ानूनी तौर पर तलाक़ नहीं लिया था मगर अब वो साथ नहीं रहते थे.इसका यह असर हुआ कि फ़िल्म डिब्बाबंद हो गई.लगभग 4 साल यूं ही गुज़र गये और इस दौरान कमाल अमरोही साहब की एक अन्य फ़िल्म "दिल अपना और प्रीत पराई"रिलीज़ हो गई.

कमाल अमरोही साहब के लिए फ़िल्म "पाकीज़ा" अपनी मुहब्बत मीना कुमारी के लिए उनके इश्क़ का एक नज़राना थी.अब क्यूंकि दोनों साथ नहीं थे, इसलिए फ़िल्म बनाने की कोई वजह नहीं थी.मगर फ़िल्म निर्माण में कई कलाकारों और फ़िल्म टेकनिशियन की रोज़ी रोटी और उनके परिवार की ज़िंदगी जुड़ी होती है.इस तरह पाकीज़ा जैसी बड़े बजट की फिल्म का रुकना कई लोगों के जीवन में आर्थिक संकट का कारण बन गया था.

इसी सब से रूबरू होते हुए कमाल अमरोही साहब ने 24 अगस्त 1968 मीना कुमारी को एक ख़त लिखा.ख़त में कमाल अमरोही साहब ने लिखा कि वो जानते हैं कि मीना कुमारी सिर्फ़ इस शर्त पर फ़िल्म पाकीज़ा को पूरा करेंगी अगर वो उन्हें तलाक़ दे दें.कमाल साहब ने आगे कहा कि उन्हें मीना कुमारी जी की हर बात मंज़ूर है और वह उन्हें हर तरह से आज़ाद करने के लिए राज़ी हैं.वो यह दरख्वास्त करते हैं कि कई लोगों की ज़िंदगी इस फिल्म के बनने से जुडी है इसलिए मीना कुमारी फ़िल्म पूरी करने में मदद करें.

इस ख़त के जवाब में मीना कुमारी ने कमाल अमरोही साहब को सन 1969 की शुरुवात में एक खत लिखा.ख़त में मीना कुमारी जी ने लिखा कि फिल्म पाकीज़ा उनके दिल के बेहद क़रीब है .वो हमेशा से फिल्म को करना चाहती थी और उन्हें फ़िल्म को पूरा करके बहुत ख़ुशी मिलेगी.साथ ही मीना कुमारी ने कहा की वह इस फ़िल्म के लिए सिर्फ १ सिक्का बतौर मेहनताना लेंगी.

उसी फ़िल्म अभिनेता सूनील दत्त और उनकी पत्नी नर्गिस दत्त ने इस फ़िल्म के शूट हुए हिस्से को देखा और बहुत प्रभावित हुए.उन्हें महसूस हुआ की यह शानदार फ़िल्म तो पूरी बननी चाहिए.दोनों ने कमाल अमरोही साहब और मीना कुमारी की मीटिंग करवाई और इस तरह फिर से एक बार फ़िल्म पाकीज़ा की शूटिंग शुरू की गई.कमाल अमरोही साहब ने मीना कुमारी जी को धन्यवाद करते हुए एक सोने का सिक्का दिया.

जब 1968 में फ़िल्म की शूटिंग दोबारा शुरू की गयी तो कमाल अमरोही साहब के सामने कई चुनौतियाँ थी.सबसे पहली चुनौती फ़िल्म की कास्टिंग और म्यूजिक को लेकर थी.फ़िल्म को शुरू हुए लगभग 10 साल हो गये थे और फ़िल्म के मुख्य अभिनेता अशोक कुमार बूढ़े हो चले थे.इसे देखते हुए कमाल अमरोही साहब ने उनके रोल सलीम के लिए एक्टर राज कुमार को साइन किया.इसके साथ ही राज कुमार की शख्सियत के हिसाब से उस रोल को बिज़नेसमैन के किरदार से बदलकर एक फ़ॉरेस्ट अधिकारी का किरदार बना दिया.हालांकि एक्टर अशोक कुमार फ़िल्म में बरक़रार रहे और उनके लिए एक नए रोल हाकिम साहब की रचना की गई.मगर अंत में ये तय हुआ कि अशोक कुमार साहब शहाबुद्दीन का किरदार निभाएँगे जबकि हाकिम साहब का रोल डी.के सप्रू करेंगे.

इसके अलावा उस वक़्त तक फ़िल्म के संगीतकार ग़ुलाम मोहम्मद साहब की मृत्यु हो चुकी थी.साथ ही समय बीतने के साथ संगीत भी बदल रहा था.कई लोगों ने कमाल अमरोही साहब से कहा कि बदलते वक़्त और संगीत के हिसाब से फिल्म में संगीतकार जोड़ी शंकर- जयकिशन को संगीत देने के लिए लिया जाए और उनसे नया संगीत बनवाया जाए.मगर कमाल अमरोही साहब ने इस बात को यह कह के ठुकरा दिया की ऐसा करना एक मर चुके कलाकर के साथ गद्दारी होगी.

जब ग़ुलाम मोहम्मद साहब बीमार थे तो उन्होंने संगीतकार नौशाद साहब से फिल्म का बचा हुआ संगीत करने के लिए कहा था.ग़ुलाम मोहम्मद साहब के कहने पर एक रोज़ जब नौशाद साहब संगीत रिकॉर्ड कर रहे थे तो ग़ुलाम मोहम्मद साहब बीमार हालत में ही रिक्शा में स्टूडियो पहुँच गये.ये देख सब हैरान रह गये.ग़ुलाम मोहम्मद साहब ने उस दिन अपनी मौजूदगी में गीत रिकॉर्ड कराया.उनके इंतकाल के बाद कमाल साहब ने बचे हुए संगीत की ज़िम्मेदारी नौशाद साहब को सौंप दी.

इसके अलावा जो चीज़ कमाल अमरोही साहब को बहुत परेशां कर रही थी वो थी मीना कुमारी की सेहत.बेइंतहा शराब पीने की वजह से मीना कुमारी लीवर सिरोसिस की बीमारी से पीड़ित थी और उनकी सेहत दिन पर दिन बिगडती जा रही थी.इसी सब में उन्होंने फिल्म की शूटिंग करने के लिए हामी भर दी थी.एक रोज़ गाने की शूटिंग करते वक़्त मीना कुमारी बेहोश होकर गिर पड़ी.इसके बाद कमाल अमरोही साहब ने फैसला किया कि बचे हुए डांस सीक्वेंस मीना कुमारी साहिबा के बॉडी डबल के साथ शूट किए जाएंगे. 

इसी दौरान एक और मज़ेदार घटना घटी.जब फ़िल्म की शूटिंग अपने अंतिम पड़ाव में थी तो कमाल अमरोही साहब मीना कुमारी के साथ मध्यप्रदेश के एक इलाके शिवपुरी में आउटडोर शूटिंग के लिए गये थे.वापस लौटते वक़्त अचानक गाडी का पेट्रोल खत्म हो गया,अब दूर दूर तक कोई आबादी नहीं थी और अगली बस सुब्ह से पहले जाती नहीं थी.कमाल अमरोही साहब ने रात वही पर गुज़ारने का तय किया.अभी रात के तक़रीबन २ बजे थे की कुछ लोगों का  समूह उस जगह पर आया जहां कमाल अमरोही और मीना कुमारी रुके थे.जब समूह के मुखिया को पता चला की गाडी में मीना कुमारी हैं तो उसने गाडी का दरवाज़ा खुलवाया और बड़े अदब के साथ कमाल अमरोही साहब और मीना कुमारी को अपने लोगों से मिलवाया.इसके साथ ही मुखिया ने कमाल अमरोही साहब और मीना कुमारी के लिए खाने पीने संगीत का अच्छा इंतज़ाम किया.इसी बीच मुखिया एक तेज़ धार वाला चाकू लेकर आया और उसने मीना कुमारी से कहा की वह उनका बहुत  बड़ा फैन है और वह चाहता है कि मीना कुमार उसके हाथ पर इस चाकू से ऑटोग्राफ दें.मीना कुमारी इस बात से घबरा गयी मगर फिर उन्होंने डरते डरते चाकू से मुखिया के हाथ पर उसका नाम लिख दिया.किसी तरह रात गुज़री और कमाल अमरोही साहब और मीना कुमारी वापस आ गये.बाद में पता चला कि रात को मीना कुमारी से ऑटोग्राफ लेने वाला मुखिया मध्यप्रदेश का मशहूर डाकू अमृत लाल था.

बहरहाल फिल्म में शूटिंग आख़िरकार 14 सालों में पूरी हुई और 4 फ़रवरी 197२ को सिनेमाघरों में रिलीज़ हुई.फ़िल्म दर्शकों को बहुत पसंद आई और मीना कुमारी अपने अभिनय से सभी के दिलों में छा गई.हालांकि फ़िल्म आलोचकों का फ़िल्म को लेकर बहुत ठंडा रिस्पांस आया.

उस वक़्त मीना कुमारी बहुत बीमार थी और उन्होंने इसी बीमारी में कमाल अमरोही साहब के साथ फिल्म का प्रीमियर देखा था.फिल्म देखकर मीना कुमारी ने कहा की उन्हें ये एहसास है की कमाल अमरोही उन्हें कितनी मुहब्बत करते हैं.मगर दुखद बात यह रही कि यह प्रीमियर उनकी जिंदगी का आखिरी प्रीमियर साबित हुआ और फ़िल्म रिलीज़ होने के २ महीने बाद मीना कुमारी जी की मौत हो गई.

इसका फ़िल्म पर बहुत गहरा असर पड़ा और देखते ही देखते फिल्म एक कल्ट क्लासिक का दर्जा हासिल करने में कामयाब रही.इस फिल्म को के.आसिफ़ की फ़िल्म मुग़ल -ए - आजम की टक्कर का क़रार दिया गया.मीना कुमारी ने अपने शानदार अभिनय से अपना नाम हिन्दुस्तानी फिल्मों के इतिहास में अमर कर लिया.मगर दुःख की इस शोहरत को देखने के लिए मीना कुमारी दुनिया में नहीं रही.

इस फ़िल्म  से जुडी एक बहुत खास बात जिसे बताए बिना ये किस्सा पूरा नहीं हो सकता.जब फ़िल्म की शूटिंग खत्म हुई और फ़िल्म एडिटिंग के लिए गई तो फ़िल्म एडिटर डी.एन.पाई ने एक सीन काट दिया.सीन कुछ यूं था कि मीना कुमारी की शादी हो जाती है और उनकी डोली बारात के साथ जा रही होती है.इसी वक़्त एक लड़की छत से खड़े होकर बड़ी हसरत से यह सब देख रही होती है.एडिटर को यह लगा कि यह सीन बेवजह फिल्म को लम्बा कर रहा है और उन्होंने सीन काट दिया.

जब ये बात कमाल अमरोही को पता चली तो भागे भागे एडिटर के पास पहुंचे और उनके फ़िल्म में सीन दोबारा जोड़ने को कहा.जब एडिटर ने इसकी वजह पूछी तो कमाल अमरोही साहब  ने कहा कि इस सीन में जो लड़की छत से साहिबजान की डोली जाते हुए देख रही है,उसके मन में भी यह सपना है कि एक दिन उसकी भी बारात आएगी और उसे भी कोई इस तरह डोली में बैठाकर ले जाएगा.दरअसल यही लड़की असली पाकीज़ा है.इस बात को सुनकर एडिटर ने फ़िल्म में सीन को जोड़ तो दिया मगर कमाल अमरोही साहब से पूछा कि उन्हें लगता है की कोई ये समझ पाएगा कि छत वाली लड़की की असल में पाकीज़ा है?.इसके जवाब में कमाल साहब ने कहा कि अगर एक आदमी भी ये समझने में कामयाब रहा तो उनका फ़िल्म बनाना सफल हो जाएगा.

इस घटना के तक़रीबन १ साल बाद एक आदमी ने कमाल अमरोही साहब को खत लिखकर यह बताया कि उसे छत पर खड़ी लड़की की तस्वीर चाहिए, जिसे देखकर उसे महसूस हुआ की वही असली पाकीज़ा है.कमाल साहब इस बात से बेहद खुश हुए और उन्होंने एडिटर डी.एन.पाई को बुलाया कहा की ये पढ़ो,ये वो आदमी है जिसने मेरी फ़िल्म देखी है.

इसके बाद कमाल अमरोही साहब ने उस इन्सान को एक खत लिखा.ख़त में कमाल साहब ने यह इजाज़त दी की अगर वह  देश में कहीं भी इस   फ़िल्म को देखना चाहेगा तो वह मुफ़्त में फिल्म देख सकता है.

इस तरह मीना कुमारी की आखिरी फ़िल्म "पाकीज़ा"उनके फ़िल्मी करियर और बॉलीवुड फ़िल्म इतिहास की क्लासिक फ़िल्म बनी।

-आशि क

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