छोड़ो सनम काहे का ग़म हँसते रहो खिलते रहो

Chhodo Sanam Kaahe Ka Gam Hanste Raho Khilte Raho : Rakesh Paan Bhandaar छोड़ो सनम काहे का ग़म हँसते रहो खिलते रहो : राकेश पान भंडार



मैं गांव जाकर पान की एक गुमटी खोलना चाहता हूं...शानदार गुमटी...!!!
गङ्गा के किनारे...चौक पे...पोस्टऑफिस के पीछे, या डीह बाबा के मंदिर के पास..!!

गुमटी के ऊपर बड़ा सा बोर्ड लगा हो.."राकेश पान भंडार"

भोर की पहली किरण और डूबते सूरज की आखिरी लाली के बीच सदाबहार रसीले पान का प्रबंध।

मेरी गुमटी मीठा, कलकतिया, मगही, ले लेकर बम्बईया और बंग्ला पान का समागम स्थल हो । 

बाहर काठ की तीन-चार बेंचें लगी हो..बांस के सहारे एक रेडियो लटका हुआ हो..जिसपर "क्या करते थे साजना...मुझे नींद न आये" सरीख़े रोमांस वाले गानों के साथ साथ मुझे जीने नही देती है याद तेरी और पियवा से पहिले हमार रहलू" जैसे विरह के गीत आते हों।

गुमटी के पीछे ईंटों के सहारे  बांस की एक चाली भी टिकी हो....जहां नौजवान अपने बाप चाचा से नज़रे बचाकर हाथ नीचे किये सिगरेट पी सकें, 
गुमटी के बाहरी दीवारों पर रानी मुखर्जी से लेकर ऐश्वर्या की तस्वीरें लगी हों जिसके अनहद सौंदर्य को गांव के लौंडे से लेकर बूढ़े तक अपनी प्यासी आंखों में उतार सकें।

सर के पीछे पराग, तिरंगा, मधु और  लोकल, से लेकर कई सारे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय ब्रांड के गुटखों की कतारें सजी हो...!!!

गुमटी के आगे चमचमाते कांच के कई सारे मर्तबान एक धारी में रक्खे हों जिसमें कई सारी टॉफियां और रूपेश  हलवाई के हाथ के बने ताजे मुरब्बे भरे हों जिसे देख कर खाने वाले कि आंत मचल जाय।


जर्दे और मसालों की क्वालिटी ऐसी हो कि खाने वाला फट्ट से गांव से दिल्ली - बनारस जा बसे लोगों को फोन करके बताए कि गांव में राकेश के पान में जो बात है, वो वहां तुम लोगों को नहीं मिलता होगा...और सुनकर दिल्ली-बनारस वाला फेसबुक पर स्टेट्स लिक्खे की "मिसिंग माई भिलेज एंड राकेश पान".....झट्ट से पांच सौ लाइक भी मिल जाय।

कांच के मर्तबान में रक्खे मुरब्बे की मिठास ऐसी हो कि मैं फेसबुकिया सहेलियों के ख्वाबों का राजकुमार बन जाऊं। 

मेरी गुमटी पर रोज ट्यूशन और कोचिंग जाने वाले नौजवानों की साइकिलें और मोटर साइकिलें खड़ी हो...सब एक साथ मिलें, देश की गिरती अर्थ व्यवस्था को ऊपर उठाने की तकनीक...एक दूसरे की सेटिंग के किस्से और पढ़ाने वाले मास्टर की चुगली  पर चर्चा करें और साथ में रसीले पान का दौर चले।

मेरी गुमटी पीपल के एक पेड़ के नीचे हो...जिसपर नेता जी का पोस्टर लगा हो। मेरी गुमटी की शोहरत ऐसी हो जहां गांधी मैदान की रैली से लौटकर आते  नौजवान और बूढ़े लालू नीतीश और मोदी की राजनैतिक नीतियों पर विमर्श करते हुए आठ दस खिल्ली पान घोंट जाएं।

कैश रखने के लिए एक लकड़ी का एक  संदूक रखूं...एक दो रुपये का खुदरा ऐसे माफ कर दूं जैसे सरकार उद्योगपतियों के हज़ारों करोड़ का कर्जा माफ कर देती है...और किसी से दस रुपया ऐसे वसूल लूं जैसे बैंक, किसानों से कर्जा वसूल लेती है।

सफेद बनियान और टेरीकाटन का बुशर्ट मेरा ट्रेडमार्क बन जाय....मैं चुपचाप एक ठहरे वक़्त की तरह सबकी बाते सुनता रहूं।

गुमटी के बाजू में मिट्टी का एक घड़ा होगा..बेंच के पास पानी का एक जग रख दूंगा...जहां कोई प्यासा पानी पीने बैठे....और रेडियो पे अचानक से गाना बज जाए...खईके पान बनारस वाला....और फट्ट से पान का आर्डर मिल जाय। जग का रंग हरा होगा।

मेरे ये सपने उस ठंडी छांव की तरह हैं जहाँ मैं बड़े बड़े सपनों के कुचले जाने के बाद पनाह पाता हूँ । किसी बड़े शहर से घबराकर पान की गुमटी में अपना एक शहर बनाता हूँ । मुझे सचमुच ऐसे सपने आते हैं । जिसमें किसी अनजान शहर से गुज़रने पर कोनेे के आख़िरी मकान में खुद को पाने लगता हूँ .... फिर रेडियो सिटी पर आ रहे गाने में खो जाता हूँ । छोड़ो सनम काहे का ग़म हँसते रहो खिलते रहो....!!!



-राकेश राज
Previous Post Next Post