निजामुद्दीन में तबलीगी जमात, कोरोना वायरस और सुकून की रोटियाँ

दिल्ली स्थित निजामुद्दीन मरकज में तबलीगी जमात मामले में कोरोना वायरस संक्रमण और सुकून की रोटियाँ

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चित्र : महेंद्र कुमार मेवाल

दिल्ली स्थित निजामुद्दीन मरकज में तबलीगी जमात मामले में कोरोना वायरस संक्रमण और सुकून की रोटियाँ : व्यंग

अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए जब वर्तमान समय का इतिहास लिखा जाएगा तो बहुत ही कठोर और निष्ठुर शब्दों के साथ यह लिखा जाएगा कि जब पूरा विश्व पेंडमिक कोरोना से लड़ रहा था ठीक उसी समय भारत कोरोना के साथ साथ जिहादियों की आतंकवादी मानसिकता से भी लड़ रहा था।

एक ओर 1962 की युद्ध में भारत- चीन सीमा रेखा को लेकर दोहरी मानसिकता ढोने वाला तानाशाही चीन था जो विश्व का शक्तिशाली राष्ट्र बनने के लिए इस वायरस का मैनुफैक्चरिंग कर रहा था और दूसरा ये जिहादी वर्ग के लोग थे जो इस वायरस को लोकल कम्युनिटी में सबसे अधिक संचारित कर रहे थे।

ये जानते हुए कि इस विकट परिस्थिति से हमसबको एक मिलकर लड़ना है....ये बीमारी को सरकार से छुपाते हुए कोरोना का अब्बा, अम्मी बनकर समुचित वर्ग में फैलाते रहे, मस्जिदों में घुसते निकलते रहे, बस पर चहड़ते हुए थूकते रहे, साफ प्लेटों और चम्मचों को चाटते रहे, आस पास के चीजों को, लोगों को, दुकानों को अधिक से अधिक छूते छापते रहे। मकसद? मकसद सिर्फ यही कि भले उनका पड़ोसी भाई अपने देश में लाल टमाटर नहीं खरीद पा रहा हो पर ये आर्यावर्त को लाल बम से उड़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे।

अब जब कुछ लोगों को ये पूछते हुए देखता हूँ कि क्या उनको अपने जान की परवाह नहीं है? तो मैं सोचता हूँ 4g के जमाने के लोग भी कितने भोले हैं जो यूटूब पर हजार तरह की चीज देखते हुए अत्यंत भोले प्रश्न करते हैं। सच तो यही है कि इन्हें जीवन की कोई परवाह नहीं है...इनका जन्म ही फटने के लिए होता है। कभी RDX के रूप में फटेंगे कभी ब्लैक पाउडर तो कभी प्लूटोनियम 239 के रूप में। और कोई दूर दराज का देश नहीं बल्कि हमारे ही पड़ोस के देश में इस आतंकवादी मानसिकता रिमोट का बटन हैंडल किया जाता है।

जब पूरा विश्व दिन में सतरह बार हाथ-गोड़ धो रहा है, सेनेटाइजर और मास्क इस्तेमाल कर रहा है, अपने घरों में बंद है तब ये कुरान्डी वर्ग मस्जिद से अंदर बाहर होते हुए कह रहे हैं कि अला ताला ने कहा है कि थूक से पोछ कर ही वायरस को दौड़ा देंगे। इन पढ़े लिखे जिहादी वर्ग से अच्छा तो गाँव की गरीब महिलाएँ हैं जो संसाधनों के अभाव में भी 10 दिन से साड़ी के अचरा से नाक और मुँह झाँपे हुई हैं।

वे मजदूर लोग इनसे कहीं अधिक अच्छे हैं जो मद्रास से उत्तरप्रदेश पैदल आने पर भी आज हाथ में खैनी ठोकते हुए अपनी पत्नी से कह रहे होते हैं...अब ई बीमरिये अइसन है तो कि कहल जाए...सरकार भी अपन भर प्रयास करिये रहले हैं। देश दुनिया सब तबाह हो गेलै हैं।

वे लोग कहीं अधिक सतर्क हैं जो बाहर ही फंस गए, घर नहीं आ पाए और अपने बूढ़े बाप को फोन पर कह रहे हैं...गेंहूँ नय कटलै उ ठीक हकै पर घरे रहा, जिंदगी बचतै त बहुते बार गेंहूँ उपजा के कटनी कर लेबै।

वे लोग उनसे कहीं अधिक अमीर हैं जो विकट परिस्थिति में क्रिकेटर, हीरो, हेरोइन, उद्योगपति का इंतजार न करते हुए pm fund में अपनी सक्षम राशि डोनेट किये या पड़ोस के भूखे जानवरों को रोटी दिये या टीम बनाकर भयमुक्त रोटियाँ बेल गरीबों के हाथ दिये।

ऐसी परिस्थिति में पुनः इस देश के ताकतवर कर्मियों का आभार व्यक्त करते हुए कह रहा हूँ कि हम सिर्फ कोरोना नामक वायरस से ही नहीं बल्कि जिहादियों की आतंकवादी मानसिकता से भी लड़ रहे हैं। इनके फूटने से पहले ही इन्हें फोड़ना होगा तभी कल को इस देश की ताई पर सुकून की रोटियाँ पक सकेंगी।

बाकी स्वस्थ रहिये, सुरक्षित रहिये साथ में इंसान बने रहिये। आवश्यक सामग्रियों के लिए सवाल-जवाब कीजिये। सरकार भी सुविधानुसार काम कर ही रही हैं।

जय हो।

- अभिषेक आर्यन
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