जीवन मृत्यु चक्र के बीच मुक्ति : Life Death Cycle

'Jivan mrityu chakr ke beech mukti' | Life Death Cycle


जीवन मृत्यु चक्र के बीच मुक्ति (Life Death Cycle)

जन्म के पहले और मृत्यु के बाद क्या है?? ये प्रश्न जिज्ञासा रूप में मनुष्य योनी को सदियों से रहा है। पहली गाँठ जीवन में बीज के रूप में लगती है व मृत्यु के साथ वो गांठ खुल जाती है। उस गांठ रूपी पोटली में दो ध्रुवों के बीच हम घूमते रहते है। यानी जीवन को हम पर्याय बना चुके होते है। हमारे जीवन में सदा द्वैत भाव भ्रमण करते रहता है। हम तराजू के दो पलड़े को ऊपर-नीचे होते देखते रहते है। इसे आप बहुत सा नाम दे सकते है। सुख दुख, अपना पराया, जीवन मरण, स्त्री पुरुष, अच्छा बुरा, खट्टा मीठा, हंसी खुशी, शोक उल्लाश, बंधन मुक्ति आदि।

जीवन सदैव दो के आधार पर चलता है। दो का होना ही द्वैत भाव को उत्पन्न करता है। चिदात्मा और शरीर का मेल इस मायाजगत की उक्ति है। अच्छा सौदा लेने दुकान पर जाएं तो क्रेता और विक्रेता संतुष्ट तभी होते है जब तराजू का दोनों पलड़ा सामान हो, एक बराबर हो। ये बराबर होना ही बीच का बोध कराता है। महाशून्य से महामाया का प्रकाट्य हुआ फिर इन दोनों से ओंकार नाद उत्पन्न हुआ। 'नाद' दोनों का संतुलन बन गया। सृष्टि स्थिर हो गयी और गति करने लगी।


उसी महाशून्य से निकली आत्मा कर्म भेद से मुक्त है परंतु माया जगत में कर्मेन्द्रियाँ, ज्ञानेन्द्रियाँ के साथ मन बुद्धि चित्त अहंकार के मेल ने उसे प्रपंचों में डाल दिया। हम मुक्त होकर भी माया के बंधन में आ गए। माया का बंधन एक उड़ान देती है, इसका विस्तार व्यापक है। पिंजड़े के संसार में होकर भी हम अपने को उन्मुक्त मानने लगे। हमने अपने जीवन के तराजू में इतने पलड़े बाँध लिए जिसे संतुलन करते-करते स्वयं तप्त हो गए किंतु तृप्त न हो पाये। 

तृप्ति न होने के कारण पुनः जीवन मरण के चक्र में घूमते जा रहे है। ये तृप्ति वास्तव में भोग नहीं है ये तृप्ति है अपनी असीम सत्ता को स्वीकार कड़ना, स्वयं ब्रह्म-बोध को जान पाना। 

इससे बेखबर हम माया में तृप्ति ढूंढने के प्रयत्न में लगे हैं। हमें भान ही नहीं रहा दोनों पलड़ा संतुलन में आये तभी सौदा पक्का माना जाता है। नहीं तो क्रेता विक्रेता अपने-अपने पलड़े पर लटक कर खींचातानी में तराजू ही तोड़ देते है। 

जीवन का डोर टूटना ही है। उससे पहले हम इस संतुलन की ओर बढ़ें। जहाँ दो के बीच ठहराव हो। आत्मिक शांति हो, अनान्द की अवस्था हो। यही विज्ञान भैरव तंत्र की रूपरेखा है। दो के बीच स्वयं को स्थिर कर को। मैं मग्न मैं चिर मग्न....फिर संसार आपके लिए छोटा पड़ जाएगा ब्रह्मबोध के चैतन्य स्नान में डुबकी लगाकर भव सागर तर जाएंगे।
..........जय महाकाल

-राजऋषि भैरव
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