प्रेम कबूतर - मानव कॉल : Prem Kabootar Book Review

प्रेम कबूतर ~ मानव कौल  (prem kabootar book review) 

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मानव कौल को पढ़ते वक्त यह तय करना मुश्किल होता है कि आप एक पाठक को पढ़ रहे हैं या लेखक को। उनके शब्दों में जितनी गंभीरता है उतना ही अल्हड़पन , वे शब्दों के साथ खेलते हैं , नाचते हैं और उनका तकिया बना कर सो जाते हैं।

शब्दों के कॉफी मग में चुस्कियां लगाते हुए मानव कौल खुद एक गरम कॉफी के घूंट बन जाते है! त्रिकोणात्मक प्रेम का एक सुंदर फ्रेम है प्रेम कबूतर।

इस कहानी की सबसे बङ़ी विशेषता यह है कि आप इसे पढ़ते हुए एक कहानी के बनने की पूरी प्रक्रिया से गुजरते हैं।

लेखक किस प्रकार से तथ्यों और पात्रों को अपने मन मुताबिक गढ़ता है उसे आप विजुलाइज कर सकते हैं । घटनाक्रम के बदलने के साथ - साथ पात्रों के नामांकरण व उनके चरित्रों का भी चित्रांकन होता रहता है।

दरअसल यह पूरी कहानी किसी पेटिंग सरीखी है जिसमें एक चित्रकार अपनी कूंची लेकर बैठा है और उसे खुद पता नहीं है कि वह क्या बनाने जा रहा है और धीरे - धीरे उसकी पेंसिल कैनवास पर फिसलती है और पात्रों के स्केच खिंचने शुरू हो जाते हैं।

उस पूरी प्रक्रिया में जहाँ लेखक गल्तियां भी करता है , झूंझलाता भी है वह सब पाठकों के सामने अंकित होता जाता है।

सलीम , मीनाक्षी , सोनाक्षी , पप्पू, नीना , और राजू आदि पात्र लेखक के दिमाग की उपज है और हम सब उन पात्रों के बीच एक गहरी डुबकी लगाने को तैयार बैठे हैं उस तालाब में जिसके बगल से वह.दरगाह की सङ़क जाती है जिससे होकर प्रतिदिन  गुजरती है दो लङ़कियां अपनी साइकिल से।


जिस तरह से तीन दोस्तों की तिकड़ी बरगद पेङ़ के पीछे छुप कर उन दोनों लङ़कियों का इंतजार करती है और किशोर वय के रुमानी किस्सों पर आधारित प्रेम पत्रों का आदान - प्रदान होता है उन सबके बीच लेखक की एक पंक्ति " प्यार आदमी को कबूतर बना देता है ' को पढ़ने से अधिक देखना दिलचस्प होता है।

सभी कबूतरों के बीच लेखक अकेला हो जाता है क्योकि वह जिससे प्रेम करता है उससे उसका जिगरी दोस्त सलीम भी करता है और उसके साथ आने वाली लङ़की को कोई और पसंद करता है।

अपनी मृत माँ के ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीर को देख कर अपने एकांत में वह अपने गम को भूलने की कोशिश करता है।

अंततः एक ऐसा मोङ़ आता है जब लेखक खुद कबूतर बन जाता है , उस समय उसके गोल - गोल नाचने और उसके मुँह से गुटुर गूं की ध्वनि पाठकों को भी कबूतर बना डालती है।

इस कहानी को पढ़ते हुए आप मध्यमवर्गीय परिवारों की गलियारे में घूमते हुए गुदगुदाएंगे , जोर - जोर से ठहाके लगाएंगे और बस नाचने लगेंगे।

-संगसार सीमा

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प्रेम कबूतर ~ मानव कौल  (prem kabootar book review) 



मैं मानव कौल की अदाकारी का बहुत बड़ा प्रशंसक हूँ । स्क्रीन पर जिस ठहराओ के साथ वो अपने किरदार को प्रस्तुत करते हैं वो काबिल ए तारीफ़ है । लेकिन अब लगता है मुझे अपने लिए एक अच्छा लेखक भी मिल गया है । कौल साहब की कहानी संग्रह 'प्रेम कबूतर' । जो ठहराओ आपको इनके अभिनय में नज़र आता है बिल्कुल वही इस किताब में भी है । ऐसा लगता है कोई सिम्फनी है जो चल रही है अनवरत और उसे चलते रहना चाहिए । मुझे लगता है काफ़ी लंबे समय के बाद मैंने कोई अच्छी किताब पढ़ी । 

मैं बहुत आलसी हूँ किताब पढ़ने के मामले में । मैं काफ़ी समय ले लेता हूँ एक किताब को ख़त्म करने में । लेकिन कुछ किताबें होती हैं जिन्हें आप अपने आस पास अनुभव कर सकते हैं। मैं चाहता हूं कि अगर मैं किताब पढ़ना शुरू करूँ तो एक बैठकी में वो किताब ख़त्म हो जाये। 'प्रेम कबूतर' ने मुझे ये सहूलियत दी।  कौल साहब की इस 8 कहानियों के संग्रह ने मुझे हर वो सहूलियत दी जो मैं एक पाठक के तौर पे चाहता था।  

चाहता हूं कि ऐसी और किताबें आएं। जिससे आने वाली पीढ़ी तक अच्छी चीज़ें पहुँच सकें। 'प्रेम कबूतर' बिल्कुल वैसी है जैसा इसे होना चाहिए। मैं इसमें लिखी कहानियों पर बात इसलिए नहीं करूँगा क्यों कि जब तक आप इसे ख़ुद नहीं पढ़ेंगे तब तक आप उन कहानियों को महसूस नहीं कर सकते हैं। 


किसी बात को कितनी ख़ूबसूरती से और आसान लफ़्ज़ों में बयां किया जा सकता है ये आप इस किताब को पढ़ कर सीख सकते हैं ।

"जूता जब काटता है तो ज़िन्दगी काटना मुश्किल हो जाता है। और जूता काटना जब बंद कर दे तो वक़्त काटना मुश्किल हो जाता है"

सच में 'शक्कर के पाँच दाने जादू हैं' और मानव कौल हमें वो जादू दिखाने वाले जादूगर ।

ये एक ऐसी किताब है जिसे आप चाहेंगे कि ये आपके साथ हर जगह हो भले आप इसे एक बार पढ़ने के बाद दुबारा ना पढ़ें लेकिन ये आपकी दिनचर्या का एक हिस्सा ज़रूर बन जाएगी । मेरे लिए तो ऐसा है ही। हम किताब पढ़ते हैं तो हर बार उनमे ख़ुद को तलाशते हैं । चाहे वो कहानी का हीरो हो या उसका दोस्त । हम सफर करना चाहते हैं उस किताब के साथ । 

मानव कौल का तह ए दिल से शुक्रिया करता हूँ ऐसी किताब से रू ब रू कराने के लिए । इसके साथ ही आशा करता हूँ कि आने वाले समय में हमें इनकी और रचनाएँ और कहानियां पढ़ने और जीने को मिले।  

- सूरज सरस्वती
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