डीजे रमेश सुरेश, दुर्गा पूजा और गाँव का मेला


बीते कई दिनों से डीजे रमेश और डीजे सुरेश ने गाँव के हरेक महेश और दिनेश के जीवन चक्र में क्रांति का धान बो दिया है। अब हर कोई इस क्रांति का सदस्य बनते हुए कमर डोला रहा है...डीजे विकास, डीजे गोलू , डीजे त्रिवेणी, डीजे आराध्या जैसे हजारों नाम इस क्रांति की नई उपलब्धि है।

भले गाँव के आधुनिक डागडरों में से किसी ने अपने प्रिय मरीजों के कान का चदरा पर टॉर्च का प्रकाश तक नहीं पटक पाया हो...पर दुर्गा पूजा समिति के अस्सी से पंचानबे डेसिबल की ध्वनि तरंग ने हरेक व्यक्ति के कान का चदरा में भूर कर दिया है।

इधर मनोहरी चाची चंदा तसीलने वाले सहकर्मियों से कह रही हैं "अजी पिछला बेर भी चंदा दलिये हल जी आ दुआर पे एक्को गो मरकरियो तक नै जलले हल, अबरी चंदा तबे दबो जब मरकरी हमार दुआरी तक अयतो"

नेताओं के बड़े बड़े वायदे की तरह पूजा समिति ने आश्वासन दिया कि...ठीक हको अबरी मरकरी आ चोंगा तोरो घर तक अयतो।

चाय के दुकानों पर बैठे बड़े बुजुर्गों को भले ये नहीं पता हो कि फाहियान, ह्वेनसांग और ली. कार्बूजियर कहाँ से आया था पर हर गलबात में यही बात उठ रही है कि किसके पंडाल का कलाकार कहाँ से आया है?

देख लीजिएगा रामपाल भिया बड़का बाजार का पंडाल अबरी जबरदस्त रहेगा...मुजफ्फरपुर बाढ़ पर आधारित पंडाल बन रहा है...अरे महाराज उसका कारीगर हर साले दिल्ली से आता है, भला काहे नहीं जबरदस्त होगा...इधर चाय सिडुकते हुए गेनहारी बाबू कह रहे हैं कि पंडाल तो हमर ससुराल में बनता है जी...दू साल हम वहाँ दुर्गा पूजा देखे हैं...वहाँ का अलग मजा है।

इधर परमोद बाबू भी अपने ससुराल का पक्ष लेते हुए बोल उठे हैं कि काली पूजा का पंडाल तो कलकत्ता में देखने लायक होता है जी...कभी घूमना हो तो वहाँ घूमियेगा...

तभी रमेसर जादो भी ये कहते हुए उछल पड़े...ए प्रमोद बाबू तोहरो ससुराल कलकत्ते हको न जी...?? हमरो भतीजिया के बड़की बेटी के बियाह उहें होले है न....

आयं चनेसर बाबू तोहर के ठो साली हको जी...? चार साली हकै जी...अ चारो सुन्नर,गोर हथिन...दू गो के बियाह त पटने में होलै हैं...अ दू गो अभी डागडरी के पढ़ाई कर रहलथिन हैं....

इसी तरह ससुराल पक्ष वालों की जीत हो रही है...चाय पीते हुए गाँव के होशियार लोगों ने एक नये तथ्य का खोज कर दिया कि...ससुराल की सालियों और पंडालों से ज्यादा खूबसूरत इस दुनिया में कुछ भी नहीं...आप किस्मत वाले हैं तो सुंदर सालियों के साथ सुंदर पंडालों का भ्रमण इसी देश व्यवस्था में रहकर कर सकते हैं। 

पूरब टोला की बड़की भौजी पश्चिम टोला की मंझली भौजी को साड़ी दिखाते हुए कह रही हैं... ए दीदी तनी देखो तौ कइसन साड़ी खरदयलै है जी...सुनिलवा के नया दुकान खुललै हैं न मोड़ पर वहीं खरदलिये हैं।

ठीके हको बहिन...तनी और दूसर रंग भी देखतो हल...सितारा वाला...अ ई जे पहिनले हको उ के सास दलथुन हैं?...नय दीदी बियाह के बाद आजतक सास हमरा एक्को कपड़ा नै दलथिन...ई तौ मौसी के बेटी के सादी में मिलले हल।

इधर देर शाम खैनी लेटाते हुए परमेसर चचा...रोटी सेंकते हुए चाची से पूछ रहे हैं कि ए मुनमुन के मम्मी आज छठी है कि सप्तमी...? चाची तावा पर रोटी घुमाते हुए कह रही हैं...परसो पंचमी हलै जी...तौ पंचमी...छठी...सप्तमी...आज सप्तमी होलै न जी...

आज गाँव के सरकारी विद्यालयों के परिसर में जब देश के भविष्य को झुलुआ झूलते, नाव पे सैर करते, आसमान तारा पे बैठ बादलों को छूते, घोड़ों पर चढ़ते-उतरते, मौत कुआँ से डरते, जादू से हैरान होते, चाट और छोला खाते देख रहा हूँ तो प्रकृति के नियम, सौंदर्य और संस्कृति को समझ बूझ पा रहा हूँ।

नवरात्रि पर्व भी लगभग समापन की ओर है। जहाँ पूरा देश नौ दिनों का समय मेंं माँ की भक्ति से सराबोर होता है। वहीं इस बार देश का कुछ हिस्सा सराबोर होने से वंचित रह गया...हे दुर्गा माता इस बार आपदाओं से पीड़ित क्षेत्रों के बच्चों को शक्ति दे बचा लीजिए...इस बार जीवन रहा तो अगले साल झुलुआ, नाव, आसमान तारा, घोड़ा, जादूगर, मेला, ठेला, मौत का कुआँ और चाट छोला दुगुने तिगुने उल्लास से देख लिया जाएगा।

जय हो।

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